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“मुझे ग्राफ़िक डिज़ाइन, संगीत और सफर करना पसंद है। हर कोई मेरी साफ़-सुथरी लिखावट (हैंडराइटिंग) की तारीफ़ करता है।”

लमिया सलीम (24) केरल के मलप्पुरम ज़िले के पुलिक्कल में 'एबिलिटी फ़ाउंडेशन' में जो भी हुनर ​​सीखती हैं, उसे पूरे मन से करती हैं। पिछले तीन सालों से वे इस सेंटर में अपनी पढ़ाई और वोकेशनल ट्रेनिंग जारी रखे हुए हैं। पेपर बैग बनाने जैसे बेसिक हुनर ​​से आगे बढ़कर, अब वे सिलाई और फ़ैशन डिज़ाइनिंग में माहिर हो गई हैं। ग्राफ़िक डिज़ाइन उन्हें सबसे ज़्यादा पसंद है। डॉक्टर बनने का उनका बचपन का सपना अब सरकारी नौकरी पाने की गंभीर कोशिश में बदल गया है। वे C-DIT का ऑफ़िस ऑटोमेशन कोर्स कर रही हैं।
 
गलतफ़हमी न पालें, लमिया, जिन्हें हल्की बौद्धिक अक्षमता (intellectual disability) है, एक अनुशासित और पक्के इरादे वाली महिला हैं! उनका जन्म सऊदी अरब के रियाद में हुआ था और वे केरल के कन्नूर में पली-बढ़ीं। जब वे साढ़े तीन साल की थीं, तो उनके माता-पिता सलीम और सुबेदा ने देखा कि उनकी बोलने की क्षमता का विकास देर से हो रहा है। मेडिकल जाँच के बाद, उन्हें 'मोज़ेक डाउन सिंड्रोम' (Mosaic Down syndrome) होने का पता चला, जो डाउन सिंड्रोम का ही एक हल्का रूप है।
 
सलीम याद करते हुए कहते हैं, “हमने उन्हें बेहतरीन देखभाल देने का पक्का इरादा कर लिया था। हम उन्हें स्पीच थेरेपी के लिए मैसूर ले गए, जहाँ 'ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ स्पीच एंड हियरिंग' [मानसगंगोत्री, मैसूर, कर्नाटक] है। बाद में हम उन्हें बेंगलुरु में 'नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस' (NIMHANS) ले गए, जहाँ हमें वहाँ के विशेषज्ञों से सलाह मिली।” शुरुआती दौर में की गई इन सभी कोशिशों ने लमिया की बातचीत करने की क्षमता को बेहतर बनाने और उनका आत्मविश्वास बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।
 
सुबेदा बताती हैं कि बचपन में लमिया को पाचन से जुड़ी समस्याएं भी थीं, जो लगभग पाँच साल की उम्र तक बनी रहीं। स्कूल जाना शुरू करने के बाद उसकी सेहत धीरे-धीरे ठीक हो गई। उसने एक आम CBSE स्कूल में पढ़ाई की और 12वीं कक्षा तक अपने साथियों के साथ मिलकर सीखा। 10वीं, 11वीं और 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं के दौरान उसे लिखने के लिए एक सहायक (स्क्राइब) दिया गया, जिससे उसे आसानी से परीक्षा पूरी करने में मदद मिली। उसने हमेशा सीखने में उत्साह दिखाया है और स्कूल की गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है।
 
'एबिलिटी सेंटर' के रिहायशी माहौल में रहने से वे और भी ज़्यादा आत्मविश्वासी, स्वतंत्र और सामाजिक रूप से सक्रिय बनी है। उनके टीचरों ने दूसरों के साथ बातचीत करने और दूसरों के प्रति सहानुभूति दिखाने के मामले में उनमें काफी सुधार देखा है। लमिया हमेशा से ही मिलनसार और स्नेहपूर्ण स्वभाव की रही हैं और अपने आस-पास के लोगों की भावनाओं को अच्छी तरह समझती हैं। सुबेदा कहती हैं कि जब परिवार का कोई करीबी सदस्य बीमार होता है या घर से दूर होता है, तो उनकी बेटी परेशान हो जाती है। हालाँकि नए लोगों के साथ घुलने-मिलने में उसे थोड़ा समय लग सकता है, लेकिन एक बार सहज महसूस करने पर वो उनके साथ मज़बूत रिश्ते बना लेती है।
 
लमिया की परवरिश एक ऐसे परिवार में हुई है जहाँ सभी सदस्य एक-दूसरे के बहुत करीब हैं — उसके माता-पिता, दो बहनें और दो भाई — और इन सभी ने हमेशा उसका हौसला बढ़ाया है। घर पर वो अपनी ज़िम्मेदारी की भावना के लिए जानी जाती हैं। वो अपनी दिनचर्या को लेकर बहुत अनुशासित हैं और आमतौर पर परिवार में सुबह सबसे पहले उठती हैं। उन्हें खाना बनाना, सफाई करना, घर को व्यवस्थित रखना और घर के काम ध्यान से पूरे करना पसंद है। जब उनकी माँ घर पर नहीं होती हैं, तो वो खुशी-खुशी अपने छोटे भाई की देखभाल करती हैं।
 
सुबेदा बताती हैं कि उनकी बेटी को तरह-तरह के व्यंजन खाने का शौक है। उसे कॉमेडी फिल्में देखना और मलयालम व तमिल संगीत सुनना पसंद है। उसे घूमना-फिरना भी अच्छा लगता है और वह नई जगहों पर जाने के लिए उत्साहित रहती है। प्रकृति के बीच समय बिताना – जैसे हरियाली में टहलना, पहाड़ों के नज़ारे देखना, नदी के किनारे आराम करना और जानवरों को देखना – उसे खुशी और मन की शांति देता है। एक सच्ची मुस्लिम होने के नाते, उसे अपने धर्म से हिम्मत मिलती है, जो उसकी ज़िंदगी में अहम भूमिका निभाता है।
 
लमिया के सफ़र को देखते हुए, सुबेदा दूसरे परिवारों के लिए एक ज़रूरी बात कहती हैं: "माता-पिता और संस्थाओं को मिलकर काम करना चाहिए ताकि विकलांग बच्चे आत्मनिर्भर बन सकें। हमें उनका साथ देना चाहिए और उनका हौसला बढ़ाना चाहिए, लेकिन उनकी विकलांगता की वजह से उन्हें ज़रूरत से ज़्यादा सुरक्षा या लाड़-प्यार देने से बचना चाहिए। उन्हें सीखने और ज़िम्मेदारी उठाने के मौके देने से वे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ पाते हैं।"”

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विक्की रॉय