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"असली डिसेबिलिटी वो होती है, जब आप हमें बराबरी की नज़र से नहीं देख पाते ”

34 साल के किलुमो एज़ुंग जब अपनी काले रंग की बाइक पर कोहिमा की सड़कों पर निकलते हैं, तो वो इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं कि बाइक ‘रेयर व्यू मिरर’ एकदम ठीक तरीके से एडजस्ट हों। क्योंकि उनके बिना उन्हें पता ही नहीं चलेगा कि कोई बेसब्र इंसान उनसे आगे निकलने के लिए लगातार हॉर्न बजा रहा है। 
सरकार के सर्व शिक्षा अभियान के तहत ‘इंडियन साइन लैंग्वेज’ (ISL) के इंस्ट्रक्टर किलुमो को फ़ुटबॉल और बाइकिंग का जुनून है। हमने उनसे नागालैंड के पहले सर्टिफ़ाइड ISL इंटरप्रेटर रूकुख्रीनुओ विज़ोथा की मदद से बात की। बातचीत के दौरान पता चला कि किलुमो के छह भाई-बहन हैं। चार उनसे बड़े, दो उनसे छोटे। किलुमो के पिता डॉ टी. एम. लोथा एक नेता हैं और वो विधायक भी रह चुके हैंजबकि माँ म्हालो एज़ुंग ‘चैरिटी क्लब मल्टीपर्पज़ सोसाइटी’ नाम की NGO में काम करती हैं। किलुमो सिर्फ़ एक साल के थे जब कान में एक फोड़ा होने की वजह से उनकी सुनने की क्षमता चली गई। जब वो 3 साल के थे तब उनके माता-पिता ने उनको गुवाहाटी में एक ENT विशेषज्ञ डॉ. एन. एन. दत्ता को दिखाया। डॉ. दत्ता ने उनको वहीं के एक स्पीच स्पेशलिस्ट के पास भेजा। जिसके बाद किलुमो के इलाज के लिए उनकी माँ ने गुवाहाटी में गी रुकने का फ़ैसला लिया। वो कुलुमो के साथ दो साल के लिए वहीं एक किराये के घर में शिफ़्ट हो गईं।
हालांकि किलुमो अपनी मूल भाषा ‘लोथा’ में हल्का फुल्का बोल लेते हैं, लेकिन ज़्यादातर बातचीत वो साइन लैंग्वेज के ज़रिए ही करते हैं; ये भाषा उन्होंने दीमापुर की ‘डेफ़ बिबलिकल मिनिस्ट्री’ में सीखी थी। उनके दोनों छोटे भाइयों, (चोंचियो और यानसथुंग), ने भी साइन लैंग्वेज सीखी है। शिलॉन्ग के ‘वोकेशनल इंस्टीट्यूट ऐंड ट्रेनिंग सेंटर’ से हाई स्कूल करने के बाद उन्होंने ‘फ़रांडो स्पीच ऐंड हेयरिंग सेंटर’ में पढ़ाना शुरू कर दिया। बाद में उन्होंने ‘इंदौर डेफ़ बाइलिंग्वल एकैडमी’ से ‘टीचिंग ISL’ में दो साल का डिप्लोमा पूरा किया।
किलुमो मुस्कुराते हुए अक्सर कहा करते हैं- "मैं मोटा हो गया हूं, लेकिन मैं अब भी फ़ुटबॉल खेलता हूँ।" वो 16 साल के थे जब टीवी पर फ़ुटबॉल देखते देखते इस खेल में उनकी रुचि बढ़ने लगी। वो ‘मैनचेस्टर युनाइटेड’ को सपोर्ट करते हैं और क्रिस्टियानो रोनाल्डो के बहुत बड़े फ़ैन हैं। किलुमो को अब भी वो पल याद है जब उन्होंने मशहूर फ़ुटबॉल खिलाड़ी सुब्रतो पॉल के साथ फ़ुटबॉल खेला था। उस वक़्त वो स्पेशल ओलम्पिक नागालैंड टीम का हिस्सा थे जिसमें 4 लोग ऐसे थे, जो सुन नहीं सकते थे। इस टीम ने बैंकॉक में FIFA ग्लोबल युनिफ़ाइड कप 2013 के क्वॉलिफ़ाइंग मैच में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। किलुमो की ज़िंदगी का एक यादगार पल वो भी है जब वो ‘वर्ल्ड फ़ेडेरेशन ऑफ़ द डेफ़’ की सालाना बैठक में हिस्सा लेने ऑस्ट्रेलिया गए थे।

मार्च 2020 में पिता को खो देना किलुमो के लिए एक बड़ा झटका था। ये ज़ख़्म तब और भी गहरा तब लगने लगा जब कोविड-19 की वजह से देशभर में लॉकडाउन लग गया और बाइकिंग का शौक़ रखने वाले किलुमो अपने सूने से घर में क़ैद होकर रह गए। महामारी से पहले वो घर पर बधिर, बधिरों के माता-पिता और दूसरे शिक्षकों को साइन लैंग्वेज पढ़ाते थे। लॉकडाउन के बाद उन्होंने ‘ज़ूम’ ऐप के ज़रिये ऑनलाइन तरीक़े से पढ़ाने की कोशिश की लेकिन फिर वो भी छोड़ दिया, क्योंकि ऑनलाइन पढ़ाई में हाथों के हावभाव में ज़रा से बदलाव से भी शब्द का पूरा मतलब बदल जाने का ख़तरा था।

किलुमो को अपनी बाइक में कुछ नया करते रहना बेहद पसन्द है। ("मैं इसे एक स्क्रैम्बलर में बदलना चाहता हूं")। साथ ही उनको वोखा की दोयांग नदी में मछली पकड़ना भी अच्छा लगता है ("आपको वहां सच में बड़ी मछली मिलती है")। दोस्तों के साथ घूमने में भी उनको ख़ूब मज़ा आता है, बल्कि यूरोप घूमना उनकी ‘बकेट लिस्ट’ में शामिल है, जहाँ उनके पसन्दीदा फ़ुटबॉल क्लब युवेंटस, चेल्सी या रियाल मैड्रिड को अपनी आँखों के सामने खेलते देखना उनके लिये किसी ख़्वाब से कम नहीं होगा।

तस्वीरें:

विक्की रॉय

वीडियो:

चंदन गोम्स