Icon to view photos in full screen

“मैं हर दिन कुछ नया सीखता हूँ। मेरा सपना एक मोटिवेश्नल स्पीकर बनने का है”

शायद साहित्य के प्रति उनका प्रेम ही है जो छत्तीसगढ़ के आसमान नाग (32) को कहावतों से इतना आकर्षित करता है। वे अपनी डायरी में और अपने कार्यालय में व्हाइटबोर्ड पर मूल और कहीं से लिए गए उद्धरण लिखते हैं, और कभी-कभी बोलते समय रूपक का इस्तेमाल करते हैं।
 
उन्होंने हमारे ईजीएस साक्षात्कारकर्ता से कहा, "मेरी व्हीलचेयर के दो पहिये ही वो रथ हैं जो धरती से आसमान तक मेरी प्रगति का पता लगाते हैं"। "एक दिन मैं अपने नाम आसमान [अर्थात आकाश] को सार्थक करूंगा, असीम आकाश की सीढ़ी पर कदम रखूंगा।" आसमान, दंतेवाड़ा में _सक्षम_ संस्थान में कार्यालय वार्डन हैं (जिसके बारे में पाठकों को हमारी हाल ही की प्रिंस यालम की कहानी से पता होगा)। 150 एकड़ की एजुकेशन सिटी में स्थित सक्षम संस्थान विकलांग आदिवासी बच्चों के लिए कार्य करता है।
 
दंतेवाड़ा के कुआकोंडा गाँव में एक किसान परिवार में जन्मे आसमान हलवी भाषा बोलते हुए बड़े हुए, जो उनके हलवा आदिवासी जनजाति की भाषा है। उनके पिता रामप्रसाद नाग अभी भी एक किसान के रूप में काम करते हैं और उनकी माँ प्रमिला नाग एक गृहिणी हैं। वे सिर्फ़ डेढ़ साल के थे जब तेज़ बुखार (शायद पोलियोमाइलाइटिस से) के कारण उनके कमर से नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया। वे कहते हैं, "डॉक्टरों ने कहा था कि मैं ठीक नहीं हो पाऊँगा, लेकिन मेरे माता-पिता ने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं अलग हूँ। मेरे बड़े भाई अशोक और बहन असमति, ख़ास तौर पर मेरे लिए सहारा बने।"
 
आसमान ने स्कूल देर से जाना शुरू किया। जब दूसरे बच्चे बाहर खेलते थे, तो वे घर के अंदर ही रहते थे। वे याद करते हैं, "कुछ छात्र मेरी हालत पर हंसते थे।" "लेकिन मुझे कुछ सच्चे दोस्त - तिरमु राम, अजय राणा और अंकित सिंह भदौरिया - भी मिले। हम अब भी संपर्क में रहते हैं।" उन्होंने दृढ़ निश्चय किया और आखिरकार 2020 में सरकारी दंतेश्वरी पीजी कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में मास्टर्स की डिग्री हासिल की। वे कहते हैं, "मुझे शेक्सपियर हमेशा से पसंद रहे हैं।" "मुझे उनकी कविताओं से ज़्यादा उनके नाटक पसंद हैं। उनमें बहुत जान है।"
 
दंतेवाड़ा, जो कि बड़े बस्तर क्षेत्र का हिस्सा है, अक्सर अपने संघर्ष के लिए बाहरी दुनिया में जाना जाता है – एक ऐसी जगह जहाँ नक्सली विद्रोह, गरीबी और राजनीतिक उपेक्षा एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। आसमान उन अशांत वर्षों को याद करते हुए कहते हैं: “हमारा गाँव हिंसा से सीधे तौर पर प्रभावित नहीं था, लेकिन हम डर और सन्नाटे के गवाह थे।” इन नाज़ुक क्षेत्रों में शिक्षा लाने के लिए, सरकार ने अस्थायी बांस के स्कूल बनाए जिन्हें सरकार ने ‘पोटा केबिन’ (हिंसा भड़कने पर आसानी से गिराए जाने के लिए डिज़ाइन किए गए पोर्टेबल ढांचे) कहा। 2011 में ₹100 करोड़ की एजुकेशन सिटी परियोजना ने आदिवासी बच्चों की स्कूल तक पहुँच को बदल दिया और इसी दृष्टि से 2014 में _सक्षम_ संस्थान का जन्म हुआ।
 
आसमान को अपना विकलांग व्यक्ति (PwD) प्रमाण पत्र 2013 में 20 वर्ष की आयु में मिला। वे कहते हैं, “मेरे माता-पिता को तो इस बात की भी जानकारी नहीं थी कि ऐसा कोई प्रमाण पत्र भी होता है।” “जब मुझे इसके बारे में पता चला तो मैंने खुद आवेदन किया। उस वर्ष, अंतरराष्ट्रीय विकलांग व्यक्ति दिवस [3 दिसंबर] पर मेरी मुलाकात जिला कलेक्टर केसी देव सेनापति से हुई। उन्होंने मुझे सक्षम संस्थान में एक पद की पेशकश की।” वार्डन के रूप में वे स्कूल के रिकॉर्ड और छात्रों की जानकारी का प्रबंधन करते हैं और भोजन और आवास के साथ-साथ प्रति माह 10,000 रुपये कमाते हैं। वे कहते हैं, “मेरे परिवार में मेरा योगदान छोटा है, लेकिन मैं वही करता हूँ जो मैं कर सकता हूँ”। “किसी भी चीज़ से ज़्यादा, मैं आत्मनिर्भर होना चाहता हूँ।” उनके बड़े भाई और एक छोटे भाई दंतेवाड़ा जिले में अस्थायी स्कूल टीचर के रूप में काम करते हैं और एक अन्य छोटे भाई चिकित्सा क्षेत्र में सरकारी नौकरी करते हैं।
 
आसमान कहते हैं, "_सक्षम_ में आने से मेरी ज़िंदगी बदल गई।" "यहाँ हर किसी की अपनी कहानी है, अपना संघर्ष है। मैं हर दिन कुछ नया सीखता हूँ।" ऐसी ही एक कहानी उनके साथी राजू मंडावी की है, जो एक भूतपूर्व नक्सली थे और जिन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। आसमान कहते हैं, " वह मुख्यधारा में वापस आने की अपनी तमन्ना को एक नए रूप में ढाल दिया।" " लोग कैसे आग में चलने के बाद भी अलग तरह से चुनाव कर सकते हैं - यह मुझे प्रेरित करता है।"
 
उनके मूक-बधिर छात्रों का दृढ़ संकल्प है जो आसमान पर सबसे गहरी छाप छोड़ता है। वे कहते हैं, "जब मैं उन्हें देखता हूँ, तो मुझे मानवीय इच्छाशक्ति की ताकत का एहसास होता है। वे अपने हाथों, अपने हाव-भावों, अपनी आंखों से बहुत स्पष्टता से बातचीत करते हैं। उनकी खामोशी खालीपन नहीं है। यह एक ऐसी ताकत से भरी है जो शब्दों से भी ज़्यादा ज़ोर से बोलती है।"
 
आसमान को 1990 के दशक के हिंदी गाने सुनना और अपने दफ़्तर में व्हाइटबोर्ड पर हिंदी और अंग्रेज़ी में प्रेरक उद्धरण लिखना पसंद है। वे कहते हैं, "कॉलेज के दिनों से ही मुझे डायरी रखना पसंद है। अब मैं दूसरों को प्रेरित करने के लिए भी लिखता हूँ"। उनकी डायरी से कुछ उद्धरण बोर्ड पर लिखें हैं: “अगर हममें कोशिश करते रहने का साहस नहीं होगा तो जीवन का क्या मतलब रह जाएगा?” और “अपने जीवन की कहानी लिखते समय, किसी और को कलम न पकड़ने दें!”
 
_सक्षम_ के अधीक्षक प्रमोद कर्मा उनका समर्थन और प्रोत्साहन करते रहते हैं। आसमान कहते हैं, "मुझे _सक्षम_ में रहना बहुत पसंद है। मैं केवल लंबी छुट्टियों के दौरान ही घर जाता हूँ। यह जगह मेरी दुनिया बन गई है। और यहाँ से मैं सपने देख सकता हूँ।" उनका एक सपना मोटिवेश्नल स्पीकर बनना है। "एक दिन, मैं बड़ी संख्या में लोगों के सामने बोलना चाहता हूँ। मैंने जो सीखा है - सिर्फ़ संघर्ष के बारे में नहीं, बल्कि आगे बढ़ने के बारे में - उसे साझा करना चाहता हूँ।"

तस्वीरें:

विक्की रॉय