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    "result": {"pageContext":{"language":"hi","pathURL":"priyanka-agarwal","isDefaultLanguage":false,"storyData":{"Name":"प्रियंका अग्रवाल","Alt_Photos":null,"Alt_Text_Photo1":"Mid shot of Priyanka Agarwal (42) sitting in a black computer-chair in front of a silver-coloured laptop. The laptop is on a brown wooden table and her fingers are on the black keyboard. To the right of the laptop there is a large computer monitor with text showing on the screen. Priyanka’s long, straight black hair is parted in the middle and she wears a pair of black headphones. Her top has thin horizontal stripes of pale yellow and white and the sleeves, pushed up to the elbows, have frilly edges. The open window in the beige wall behind her has white horizontal bars.","Alt_Text_Photo2":"Priyanka sits on an adjustable weight bench in a gym with a pale grey floor. The bench has a black seat and pale grey metallic frame. She is barefoot and wears black pants and a waist-length beige top with short Magyar sleeves and round neck. She is holding up a pair of black dumbbells to shoulder level. Her feet are apart, back straight and chin up. The wall behind her is black with a corrugated surface. There is a pair of black dumbbells lying on the floor to the left. To the right of the weight bench there is another piece of black gym equipment – a lat pull-down machine.","Alt_Text_Photo3":"Side shot of Priyanka sitting cross-legged on the floor. She wears a full-sleeved kameez with diagonal stripes of white and golden yellow, a golden yellow salwar, and a golden yellow silken dupatta draped across her shoulders. She sits in front of a brown wooden rack with two shelves. The base of the brown wooden rack has two drawers. The bottom shelf has a small female idol with an ornate golden crown and a yellow full skirt spread out in a circle. There are small brass pooja items next to it: a bell, a diya holder, a kalash (urn), and a plate. The top shelf shows a small bottle of oil and a brass diya with a white cotton wick.","Alt_Text_Photo4":"Priyanka, wearing a mud-brown half-sleeved, round-necked, corduroy top and grey track pants, is in the kitchen. Her hair is held back with a black plastic headband. She stands in front of a black marble platform. She holds a small steel bowl in her left hand and a tablespoon in her right. The spoon contains a liquid she has taken from a tall, cylindrical steel vessel below it. To the right of the vessel there is a steel plate containing six cream-coloured gol gappa (crisp round shells meant to contain pani puri). Behind it on the platform there is a closed steel dabba, a steel dish containing the potato filling for the pani puri, and a jade green plastic receptacle containing spoons, knives with black handles, and a pair of scissors with jade green handles. To the left of the plastic receptacle there is an upright white paper roll of kitchen towel. The wall tiles are squares of different shades of brown and grey.","Alt_Text_Photo5":"Priyanka and her husband Dimpesh Bhatewara (38) sit on a wooden divan bed. The bed is pushed against a beige wall in which there is a window with horizontal white bars. A mocha-brown curtain is drawn to the left. Dimpesh sits to the left with his legs over the side of the bed. Priyanka sits cross-legged to the right, facing Dimpesh. They are smiling broadly at each other. Dimpesh wears a dull, burnt-rose, half-sleeved knitted shirt and grey shorts. He wears specs with black square frames and his short black hair has a side parting. Priyanka wears her mud-brown corduroy top and grey pants. Each of them holds a white porcelain cup, Priyanka holding it in her right hand resting on her right thigh, and Dimpesh cupping it with both hands resting on his lap. The mattress on the bed has a design of cerulean blue and pale grey on a white background. There is a white porcelain saucer between them on the mattress. It contains a samosa. A grey and black backpack behind Dimpesh leans against the window sill. A grey peaked cap face-down is hooked on to on the front of the backpack.","Alt_Text_Video":null,"Photo1_URL":"https://egsweb.s3.ap-south-1.amazonaws.com/Priyanka_Agarwal/_O2A3562.jpg","Photo2_URL":"https://egsweb.s3.ap-south-1.amazonaws.com/Priyanka_Agarwal/_O2A3473.jpg","Photo3_URL":"https://egsweb.s3.ap-south-1.amazonaws.com/Priyanka_Agarwal/_O2A3652.jpg","Photo4_URL":"https://egsweb.s3.ap-south-1.amazonaws.com/Priyanka_Agarwal/_O2A3619.jpg","Photo5_URL":"https://egsweb.s3.ap-south-1.amazonaws.com/Priyanka_Agarwal/_O2A3586.jpg","Name_English":"Priyanka Agarwal","Language":"hi","Disability":["rec7wLjRz1nopX3Cz"],"Gender":"Female","Instagram_Content":null,"Quote":"“भविष्य से डरने के बजाय, आज को अपनाएं और वो काम करें जिनसे आपको खुशी मिलती है।”","Status":"Published","Video":null,"Website_Content":"बेंगलुरु की प्रियंका अग्रवाल (42) भले ही माउंट एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुँचने वाली दूसरी दृष्टिबाधित भारतीय महिला और कर्नाटक की पहली महिला बन गई हों, लेकिन उनकी ज़िंदगी की चढ़ाई किसी हिमालय जैसी उपलब्धि से कम नहीं रही है।\n \nप्रियंका के बिजनेसमैन पिता कोलकाता, जहाँ उनका जन्म हुआ था, से केरल के एर्नाकुलम में चले गए, जहाँ उन्होंने अपनी ज़्यादातर पढ़ाई पूरी की। उनकी पहली मुश्किल तब सामने आई जब वे 10 साल की थीं और उन्हें पता चला कि वे कक्षा में आखिरी बेंच से ब्लैकबोर्ड नहीं पढ़ पा रही थीं। डॉक्टर ने चश्मा तो दिया, लेकिन परिवार को यह नहीं बताया कि उन्हें रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा (RP) है, जो एक लाइलाज आनुवांशिक बीमारी है जिसमें धीरे-धीरे नज़र कमज़ोर होती जाती है। जब वे दसवीं कक्षा में थीं, तो अर्धवार्षिक परीक्षाओं के दौरान उन्हें हिंदी के पेपर में प्रश्न मुश्किल से दिख रहे थे। किसी तरह उन्होंने 10वीं कक्षा की अंतिम बोर्ड परीक्षा पास कर ली।\n \n1999 में डॉक्टर के पास अगली बार जाने पर पता चला कि उन्हें रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा (RP) है। चूँकि उनके परिवार में किसी और को यह बीमारी नहीं थी – न उनके माता-पिता को, न उनकी दो बड़ी बहनों या छोटे भाई को – तो डॉक्टर ने कहा कि शायद किसी अप्रभावी (रिसेसिव) जीन की वजह से ऐसा हुआ हो। वे याद करती हैं, “उस समय तक मैं देख सकती थी, चल-फिर सकती थी और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल कर सकती थी। मुझे साइकिल चलाना बहुत पसंद था।” उनके परिवार को उम्मीद थी कि विटामिन ए लेने और खूब गाजर खाने से नज़र कमज़ोर होने की रफ़्तार धीमी हो जाएगी। हालाँकि, धीरे-धीरे दूसरे लक्षण - रात में न दिखना (नाइट ब्लाइंडनेस), रंगों की पहचान न कर पाना (कलर ब्लाइंडनेस) और टनल विज़न (सिर्फ़ सामने का दिखना) - भी दिखने लगे। 12वीं कक्षा के बाद से उन्हें टीचरों से परीक्षा के प्रश्न ज़ोर से पढ़कर सुनाने के लिए से कहना पड़ता था।\n \n2004 में उन्होंने कोट्टायम की एम.जी. यूनिवर्सिटी से बी कॉम पूरा किया। उनकी एक बहन ने नौकरी करना शुरू कर दिया। वे कहती हैं, “इससे मुझे प्रेरणा मिली। मेरे रूढ़िवादी मारवाड़ी समुदाय में लड़कियाँ नौकरी नहीं करतीं। मैंने भी नौकरी करने का पक्का इरादा कर लिया।” उन्होंने कई टेलिमार्केटिंग की नौकरियाँ कीं, जहाँ उनके बातचीत करने के हुनर​​(कम्युनिकेशन स्किल्स) के लिए उन्हें अच्छा फ़ीडबैक मिला और उनके काम के लिए सम्मानित भी किया गया। फिर 2007 में परिवार वापस कोलकाता चला गया क्योंकि उनके पिता का बिज़नेस अच्छा नहीं चल रहा था। उन्होंने नौकरी ढूँढने की कोशिश की, लेकिन उनका कॉल सेंटर का अनुभव किसी भी नौकरी के काम नहीं आया क्योंकि उन नौकरियों में फील्ड वर्क करना पड़ता था। पाँच साल तक वे घर पर ही रहीं और इस दौरान उनकी माँ ने उन्हें खाना बनाना और घर के काम सिखाए।\n \nइसी बीच, 2009 में प्रियंका अपने एक कज़िन की शादी में नेपाल गईं। वहाँ उनकी मुलाक़ात कज़िन की मंगेतर की दृष्टिबाधित सहेली सुरभि से हुई, जिन्होंने उन्हें कंप्यूटर स्क्रीन रीडर सॉफ़्टवेयर 'JAWS' के बारे में बताया। प्रियंका को यह बहुत दिलचस्प लगा और उन्होंने हैदराबाद में गूगल में काम करने वाले अपने भाई से पता करने को कहा कि क्या भारत में भी नेपाल के उस एनजीओ जैसा कोई संगठन है जिसने सुरभि को JAWS सिखाया था। उन्हें 'नेशनल एसोसिएशन फ़ॉर द ब्लाइंड' (NAB) के बारे में पता चला और उन्होंने वहाँ से दृष्टिबाधित लोगों के लिए चलने वाला तीन महीने का कंप्यूटर ट्रेनिंग कोर्स किया।\n \nप्रियंका ने ऑनलाइन नौकरी के लिए आवेदन करना शुरू किया। उस समय दो जगहों पर भर्ती प्रक्रिया चल रही थी। इंटरव्यू राउंड के दौरान उम्मीदें तो जगीं, लेकिन दोनों कंपनियों ने एक ही जवाब देकर उनकी उम्मीदें तोड़ दीं कि वे अपने कंप्यूटर सिस्टम पर JAWS इंस्टॉल नहीं कर सकते थे। उन्हें याद है कि चार राउंड के इंटरव्यू — जो उन्हें सफल लग रहे थे — के बाद वे बेहद निराश होकर लौटी थीं। वे कहती हैं, \"घर लौटते समय मैं पूरे रास्ते रोती रही। मैंने ईश्वर से बस एक और मौका माँगा कि एक साल के भीतर मुझे वैसी ही या उससे बेहतर नौकरी मिल जाए।\"\n \nप्रियंका ने एनएबी (NAB) में वॉलंटियर के तौर पर काम करना शुरू किया — सीखना, सिखाना और दूसरों की मदद करना। वे 'इनेबल इंडिया' के संपर्क में आईं और अपने माता-पिता को बैंगलोर जाने के लिए मनाने के बाद, उन्होंने तीन महीने की ट्रेनिंग ली। ट्रेनिंग के बाद नौकरी मिलने का सिलसिला शुरू हुआ और आखिरकार 2012 में — यानी दो बार रिजेक्ट होने के ठीक एक साल बाद — उन्हें आईबीएम में अच्छे वेतन वाली नौकरी मिल गई!\n \nआईबीएम में उनका कैरियर तेज़ी से आगे बढ़ा। काम में अच्छा प्रदर्शन करने के साथ-साथ, वे एक उत्साही वॉलंटियर भी थीं। उन्होंने विकलांगों के लिए बने कोर ग्रुप की टीम लीडर के तौर पर कई कार्यक्रम आयोजित किए; इस ग्रुप को आईबीएम में दो बार 'बेस्ट ग्रुप' का अवॉर्ड मिला। 2018 में उन्होंने घर खरीदने का फ़ैसला किया। उन्होंने शुरुआती पेमेंट किया, लोन लिया और अपनी ज़रूरतों के हिसाब से घर का डिज़ाइन तैयार करवाया। उनके परिवार वाले हैरान रह गए जब उन्हें पता चला कि उन्होंने यह सब अकेले ही किया है। अगस्त 2019 में वह डेल्ल (Dell) से जुड़ीं, जहाँ अभी वे प्रोडक्ट मैनेजर के तौर पर काम कर रही हैं।\n \nउनके खरीदे गए घर में एक और सदस्य आ गया, क्योंकि उन्हें प्यार मिल गया! आईबीएम में उन्होंने 'ब्लाइंड वॉकथॉन' आयोजित किया था और डिम्पेश भाटेवारा (38) उस कार्यक्रम के लिए टी-शर्ट लेने आए थे। दोनों की जान-पहचान हुई, फिर कोविड के दौरान जब डिम्पेश अपने होमटाउन चले गए तो संपर्क टूट गया, लेकिन 2021 में वे फिर जुड़े और उन्हें एहसास हुआ कि वे एक-दूसरे से प्यार करते हैं। डिम्पेश के तलाक और माता-पिता के कड़े विरोध का सामना करने के बाद, आखिरकार 4 दिसंबर 2023 को उन्होंने कोर्ट में शादी कर ली।\n \nप्रियंका के वॉलंटियरिंग के कामों में 'इंडिया इन्क्लूजन समिट' (IIS) से जुड़ना एक अहम हिस्सा रहा है। वे कहती हैं, \"2015 के बाद मैं 'प्रियंका 2.0' बन गई।\" उस साल उन्होंने आईआईएस  में हिस्सा लिया और वहाँ विकलांग वक्ताओं को देखकर वे बहुत प्रभावित हुईं। वे कहती हैं, \"इसने ज़िंदगी के प्रति मेरा नज़रिया बदल दिया।\" अगले साल उन्हें खुद वक्ता के तौर पर बुलाया गया और 2025 में वे  एमसी (emcee) बनीं। वक्ताओं में से एक टिंकेश कौशिक थे, जिनके शरीर के तीन अंग नहीं हैं (triple-amputee) और जिनका एनजीओ विकलांगों के लिए सुलभ एडवेंचर स्पोर्ट्स को बढ़ावा देता है। वे अप्रैल 2026 में एवरेस्ट बेस कैंप के लिए 12 दिन की एक 'इन्क्लूसिव ट्रेक' (सबके लिए खुली ट्रेक) आयोजित कर रहे थे। इस बात ने प्रियंका का ध्यान खींचा।\n \nऔर बाकी, जैसा कि कहा जाता है, इतिहास है।बेस कैंप पर खड़े होकर उन्होंने माउंट एवरेस्ट को उसी तरह देखा जैसा उन्होंने बचपन में तस्वीरों वाली किताबों या फ़िल्मों में देखा था — एक त्रिकोण जिसका निचला हिस्सा भूरा या ग्रे और ऊपरी आधा हिस्सा सफ़ेद था। वो स्पष्ट करती हैं कि यह चढ़ाई कोई लंबे समय से पाला हुआ सपना नहीं था; उनके पास हासिल करने के लिए 'कारनामों' की कोई लिस्ट नहीं है। वे अपने नज़रिए के बारे में बताती हैं, \"ये चीज़ें मेरे सामने आती हैं और एक आवाज़ मुझसे कहती है कि मैं यह कर सकती हूँ।\" यह जॉर्ज मैलोरी के उन मशहूर शब्दों की याद दिलाता है, जिन्होंने एवरेस्ट पर चढ़ने की इच्छा के बारे में पूछे जाने पर जवाब दिया था, \"क्योंकि वो पहाड़ वहाँ है।\"\n\n","State_name":"कर्नाटक","Display_Order":265}}},
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